लम्हा

 

एक लम्हा गिर के चुर हो गया 
सारी आवांजे बिखर गई
उस सुनसान फर्श पर 
फिर खरोंचे आ गई 


कुछ पलंग के निचे लुडकी
कुछ तावदान मे अटकी
मुकद्दर से फिसलकर 
कब्र से आरजु जाग गई 


कुछ गिलासों मे खनकी 
कुछ खामोशीयों मे उलझी 
रिश्तो के शमशान मे 
फिर एक जान तडप गई 


कुछ रोशनीयो की शोर मे बुझी 
कुछ ॹमीर के अंधेरों मे डुबी
बेहरे कानों की चौखट पर अंजान 
खुदको फिर दोहरा गई 
 
कुछ बह गई 
कुछ थम गई
यादों की लौ मे    
एक बरसात फिर जल गई 


कुछ रेंगती दहलीज के पार
कुछ हलकेसे अंदर आ गई 
ईरादों के घमासान मे मुझे
फिर एक सपनोंसी निंद आ गई

 

कुछ आहट बन गयी 

कुछ एहसास बन गयी   

फिर जिने की तडप मे वो पगली

एक लाश की धडकने बन गयी 

 

कुछ नब्ज मे धडकी 

कुछ मुठ्ठीयो मे पटकी 

दिल की पथरियो से 

तिनका तिनका बहा गयी 

 

कुछ तलाश बन गई

कुछ जुनुन बन गई

कायनात से झुंझती फिर 

अरमानो से टपकती बुंद बन गयी 

 

वो दहाडती गई

वो फिर खदेडती गई

उन इजहारों के तु्फानों मे 
मेरी ही आवाज खो गई

 

बेबसी के सन्नाटे मे रातभर 

टपक रहा था कानोसे बहता लहु 

अौर सर्द सुबह के आगोश मे .. 

उस लम्हे कि फिर उम्मीदे जम गयी ! 

यतिंद्र २०१८